Thursday, 14 November 2013

Kavita

एक सोच है,
मेरी तुम्हारी,
ब्रह्माण्ड में टंगे तारों,
से लटकती एक कहानी भी,
यही है,
सूरज की किरणो से जलती,
ज़िन्दगी,
तोह कभी चाँद के आकर्षण में,
छलांगे मारती लहरों कि दास्ताँ,
यही है  …

रात को अँधेरे में,
मुझे चिढ़ाती हुए चांदनी है ये,
भरी दोपहर पसीने के रूप में आकर,
बारिशों की याद दिलाती है ये,
जो ठण्ड में ठिठरु मैं,
तो एक गरम अफसाना बन,
मुझे अपने पास बिठाती है ये,
सुबह की पहली रेलगाड़ी की सीटी बन,
दूर देशों की याद,
मेरे सिरहाने छोड़ जाती है ये,
एक दोस्त,
एक दुश्मन
यही है,
एक कविता,
मेरी तुम्हारी। 

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